यह ऐसा शांति प्रेमी देश है जो आतंकवाद के इतनी घिनौनी घटना से अंजान था। पूरी दुनिया दूर बसे इस द्पीप के साथ खड़ी हुई।
हक़ीक़त यह है कि मस्जिदों में मुसलमानों का ख़ून ख़ुद उनके ही धर्म के लोगों के हाथों निरंतरता से बहाया जाता रहा है। आतंकवाद की निंदा कर दी जाती है और ज़िंदगी आगे बढ़ जाती है। न तो घायलों और जीवित बच जाने वालों के साथ न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न जैसी हमदर्दी दिखाने वाला कोई होता है और न ही उनके अंदाज़ में आतंकवाद पर अंकुशल लगाने की कार्यवाही करने वाला कोई होता है।
अफ़ग़ानिस्तान से लेकर इराक़ तक नमाज़ियों को मस्जिदों और उपासना स्थलों में मारा जाता है। क्या यह संवेदनहीनता का चिन्ह है या फिर यह वर्षों की हिंसा का नतीजा है जिसने हमें तकलीफ़ में डूबे लोगों के साथ दर्द बांटने की क्षमता से वंचित कर दिया है? जब कोई हज़ारा जाति का शीया बम हमले का निशाना बनता है तो क्या उसका ख़ून हमारे ख़ून से अलग होता है?
2014 में जब पेशावर के एक स्कूल पर हमला हुआ जिसमें चरमपंथियों के हाथों 140 बच्चों का जनसंहार किया गया था तो बहुत बड़ी बड़ी हस्तियां वहां सहानुभूति जताने के लिए पहुंची थीं लेकिन जब इसी तरह के आतंकी हमले अन्य स्थानों पर हुए तो वहां कौन पहुंचा?
जब इस्राईली और उनके अमरीकी समर्थक अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन के नए इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करना शुरू करते हैं तो मुस्लिम दुनिया में इस अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के खुले हनन पर कुछ गिने चुने देशों के अलावा कहीं कोई प्रदर्शन तक नहीं होता।
जहां हम कश्मीरियों के लिए इंसाफ़ की मांग करते हैं, वहीं दुनिया के अन्य इलाक़ों में बसने वाले मुसलमानों की कठिनाइयों से हमें कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। अगर हम रोहिंग्या नरसंहार के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं तो इसके लिए केवल आनलाइन माध्यमों के प्रयोग के लिए कुछ नहीं करते।
अगर हम यह मानते हुए बड़े हुए हैं कि सब कुछ पहले से लिखा हुआ है फिर तो उपासकों की मौत भी उनकी कर्मों का प्रतिफल है अतः उन पर हमला करने वालों की निंदा करने की क्या ज़रूरत है!
दरअस्ल यह एक बहुत तकलीदेह सोच है क्योंकि इसका मतलब यह हुआ कि मुस्लिम समाजों में हालात अपने ढर्रे पर आगे बढ़ते रहते हैं। भारत के भीतर भी अछूत इसलिए निचले समाजी वर्ग तक सीमित रहते हैं क्योंकि लोगों के निकट हिंदु आस्थाओं के अनुसार उनका मुक़द्दर ही कुछ इस प्रकार का लिखा गया। कैथोलिक चर्च के अधीन ईसाइयों को रिफ़ार्मेशन और इसके बाद एन्लाइटमेंट जैसे आंदोलन के रूप में आज़ादी मिलने से पहले उनकी तक़दीर ने उन्हें कैथोलिक चर्च के भारी दबाव में रखा।
सही सोच यह है कि औपनिवेशी दौर को समाप्त हुए 70 साल बीत चुके हैं इस लंबी अवधि में हमें अपने हाथ से अपनी क़िस्मत संवारने के लिए जो कुछ करना चाहिए था वह हमने नहीं किया। हम हालात को अपनी क़िस्मत मान लेते हैं और सारा दोष क़िस्मत को देने लगते हैं और इसी का फ़ायदा हमारे अत्याचारी शासक उठाते हैं।
चीन अपने अनेक आविष्कारों के बावजूद कई शताब्दियों तक कमज़ोर और वैश्विक परिदृष्य में बहुत धूमिल रहा। बारूद का आविष्कार चीन ने किया था लेकिन चीनियों ने इसे बंदूक़ और तोप बनाने के लिए प्रयोग नहीं किया। हथियार बनाने का काम यूरोप और पश्चिमी ने किया तथा इसे हथियार के रूप में प्रयोग करते हुए वह दुनिया पर छा गया। क़ुतुबनुमा या कंपास चीन का आविष्कार है लेकिन इसकी मदद से पश्चिम ने दुनिया का बड़ा भूभाग खोज निकाला और उसे जीत लिया।
यहां यह पाठ मिलता है कि हालात को भाग का लिखा मान कर बैठ जाने नहीं बल्कि मेहनत से आगे बढ़ने की स्थिति में हम अपने हालात बदल सकते हैं।
इरफ़ान हुसैन, पाकिस्तान के वरिष्ठ टीकाकार